Sunday, September 12, 2010

हमर पहिल हाइकु


हमर पहिल हाइकु 

संस्कृत साहित्य में सहस्त्रों वर्षों पूर्व त्रिपदिक छंद रचे गए जिनमें गायत्री तथा ककुप प्रसिद्ध हैं. हाइकु मूलतः त्रिपदिक (तीन पदों अर्थात पंक्तियों का ) जापानी छंद है. जापान में इस छंद में प्राकृतिक छटा का वर्णन करने की परंपरा है किन्तु हिन्दी में हाइकु किसी विशेष विषय तक सीमित नहीं है. गीता का हाइकु में अनुवाद हुआ है. हाइकु गीत और ग़ज़ल लिखे गए हैं. हाइकु में खंड काव्य भी है. हाइकु में पंक्तियाँ केवल ३ होती हैं. पहली पंक्ति में ५ अक्षर होते हैं, दूसरी पंक्ति में ७ तथा तीसरी पंक्ति में ५ अक्षर होते हैं.  मूलतः  तो संस्कृत की देन है जो जापान जाकर फिर नया रूप लेकर भारत में आयी कविन्द्र रविन्द्र नाथ जी तथा कुछ अन्य कवि इसे जापान से भारत में लाये तथा इसमें लिखा.हाइकु में अक्षर या वर्ण गिनते  समय लघु या दीर्घ  मात्र में अंतर न कर दोनों को एक माना जाता है. संयुक्त अक्षर (क्त, द्य, क्ष आदि) भी एक ही गिने जाते हैं. जापान में कई अन्य त्रिपदी छंद स्नैर्यु आदि भी हैं.


हाइकु के शिल्प के सम्बन्ध में एक बात और: हाइकु में पदों की तुक के बारे में पूरी छूट है. तुक मिलाना जरूरी नहीं है. हिन्दी कविता में सरसता तथा गेयताजनित माधुर्य की परंपरा है, किन्तु केवल समर्थ कवि ही तुक में लिख पाते हैं.


इस दृष्टि से हाइकु के ५ प्रकार हो सकते हैं: १. तुक विहीन, २. पहले-दूसरे पद की तुक समान हो, ३. पहले-तीसरे पद की तुक समान हो, ४. दूसरे-तीसरे पद की तुक समान हो, ५. तीनों पदों की तुक समान हो.




इ हमर पहिल हाइकु अछि जाहि केर श्रेय आचार्य श्री संजीव वर्मा"सलिल" के जाइत छैन्ह . हुनके प्रोत्साहन पर आइ हम अपन पहिल हाइकु लिखलहुं  अछि .

"अहिंक धीया "

आस बनल 



अछि अहाँक अम्बे
हम टूगर

ध्यान धरब
हम कोना आ नहि
सूझे तइयो 

पाप बहुत 
हम कयने छी हे 
अहिंक धीया

जायब कत
आब नहि सूझय
करू उद्धार 

- कुसुम ठाकुर-
  

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